Saket Building Collapse: मलबे के नीचे दोस्ती की जीत — "मुझे छोड़ो, पहले अनुज को बचाओ"
रात के अंधेरे में, सांसें थम रही थीं, पैर सुन्न हो चुके थे — लेकिन एक दोस्त की आवाज थी जो जिंदगी और मौत के बीच खड़ी थी। यह कहानी है विशाल और अनुज की — दो ऐसे यारों की, जिन्होंने मलबे के नीचे भी एक-दूसरे का हाथ नहीं छोड़ा।
दिल्ली के साकेत इलाके में सैदुलाजाब की एक बहुमंजिला इमारत 2 जून 2026 की शाम अचानक ढह गई। इस दर्दनाक हादसे में 6 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है और कई घायल हैं। कोचिंग और पीजी में रहने वाले दर्जनों छात्र पल भर में मलबे के नीचे दब गए। लेकिन इस तबाही के बीच इंसानियत और दोस्ती की जो मिसाल सामने आई, वो दिल को झकझोर देती है।
शाम के करीब 7:30 बज रहे थे। विशाल अपने दोस्तों के साथ मेस में खाना खाने गए थे। खाने के बाद सब निकलने ही वाले थे कि मेस वाली पार्वती आंटी भागते हुए अंदर आईं और चिल्लाईं — "बिल्डिंग गिर रही है!" इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, कुछ ही सेकंड में पूरी इमारत मलबे के ढेर में तब्दील हो गई।
- स्थान: सैदुलाजाब, साकेत, नई दिल्ली
- तारीख: 2 जून 2026, शाम लगभग 7:30 बजे
- मौतें: 6 लोगों की पुष्टि
- बचाए गए: विशाल, अनुज, आशुतोष, आदित्य सहित कई
- इलाज: AIIMS ट्रॉमा सेंटर, नई दिल्ली
- कारण: गैरकानूनी निर्माण, अतिरिक्त मंजिलें
बिल्डिंग गिरने के बाद चारों तरफ सिर्फ अंधेरा था। विशाल जब होश में आए तो खुद को मलबे में दबा पाया। एक टूटी हुई मेज ने उनके ऊपरी हिस्से को तो बचा लिया था, लेकिन भारी खंभों ने उनके पैर और सीना दबा दिया था। वो हिल भी नहीं पा रहे थे। पास ही उनके दोस्त अनुज भी उसी तरह फंसे थे।
24 साल के इंजीनियर और IES एस्पिरेंट विशाल ने बाद में टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए बताया — "वो मंजर बहुत बुरा था। मुझे मलबे के नीचे से लोगों के चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं, लेकिन मुझे नहीं पता था कि बाहर मेरी आवाज किसी को सुनाई दे रही है या नहीं।"
यही वो पल था जिसने पूरे देश का दिल जीत लिया। जब रेस्क्यू टीम ने कटर से विशाल के पैर पर गिरा खंभा हटाया, तो खुद बुरी तरह फंसे और दर्द से कराहते विशाल ने टीम से सिर्फ एक बात कही —
यह सुनकर वहां मौजूद रेस्क्यू कर्मी भी भावुक हो गए। एक लड़का जो खुद मौत के मुंह में था, वो अपनी जान से पहले दोस्त की फिक्र कर रहा था। यही दोस्ती है, यही इंसानियत है।
विशाल को अस्पताल में कई फ्रैक्चर के साथ भर्ती किया गया। कानपुर से भागकर आई उनकी बड़ी बहन लवली देवी अस्पताल में उनकी देखभाल कर रही हैं। वहीं दोस्त अनुज अभी भी ICU में जिंदगी की जंग लड़ रहा है। इस हादसे में विशाल के दो और दोस्त — कपिल और नलिन — जिंदगी की बाजी हार गए, जबकि आशुतोष बच गए।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बिल्डिंग का मालिक हर महीने किराए से करीब 10 लाख रुपये कमाता था और और मुनाफा बढ़ाने के लिए गैरकानूनी तरीके से नई मंजिलें बनाने का काम चल रहा था। यह हादसा एक बार फिर दिल्ली में अवैध निर्माण और सरकारी लापरवाही पर गंभीर सवाल उठाता है।
इससे पहले एक और दिल छू लेने वाली कहानी सामने आई थी — मेस वाली पार्वती आंटी की, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना कई बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाला लेकिन खुद मलबे की चपेट में आ गईं। यह हादसा जितना दर्दनाक है, उतने ही मानवीय साहस के किस्से भी इसमें दफन हैं।
विशाल और अनुज की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि सबसे बड़ी ताकत इंसान के भीतर होती है — और वो ताकत है प्यार, दोस्ती और एक-दूसरे की फिक्र। जब चारों तरफ अंधेरा था, तब एक दोस्त की आवाज ने दूसरे को जीने की वजह दी।
यह हादसा हमें यह भी सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर कब तक हम अवैध निर्माण और सिस्टम की लापरवाही की कीमत अपनी जिंदगियों से चुकाते रहेंगे। कपिल और नलिन जैसे नौजवान जो सपने लेकर दिल्ली आए थे, वो अब हमारे बीच नहीं हैं — उनके लिए इंसाफ जरूरी है।
