Delhi Fire Hero: जलते होटल के नीचे गद्दे बिछाकर 8 जिंदगियां बचाने वाले रियाजुद्दीन मंसूरी को अब सरकार से क्यों मांगना पड़ा ₹2 लाख का मुआवजा?
3 जून 2026 को दिल्ली के फ्लोरिश स्टे होटल में लगी आग ने 21 लोगों की जान ले ली — लेकिन उसी भीड़ में एक शख्स था जिसने बिना सोचे अपनी दुकान खोल दी और मौत के मुंह में जाने से 8 लोगों को रोक लिया।
दिल्ली के मालवीय नगर स्थित फ्लोरिश स्टे होटल में लगी आग (प्रतीकात्मक तस्वीर)
3 जून 2026 की वो भयावह शाम — जब दिल्ली के मालवीय नगर स्थित फ्लोरिश स्टे होटल में आग की लपटें आसमान छूने लगीं, तो होटल के ऊपरी मंजिलों पर फंसे लोग चीखते-चिल्लाते खिड़कियों से झांक रहे थे। नीचे जाने का एकमात्र रास्ता धुएं और आग में बंद हो चुका था। जान बचाने के लिए लोगों के पास सिर्फ एक ही रास्ता था — खिड़की से नीचे कूदना। और नीचे थी कठोर सड़क।
ठीक उसी वक्त एक शख्स ने वो किया जो शायद कोई आम इंसान सोच भी नहीं सकता था। पास की गद्दे की दुकान के मालिक रियाजुद्दीन मंसूरी ने अपनी दुकान खोली और अपने बेटे अरमान के साथ मिलकर दर्जनों गद्दे और रजाइयां सड़क पर बिछा दिए — ताकि ऊपर से कूदने वालों को नीचे गिरने पर जान बचने का मौका मिल सके। उनकी इस एक फैसले ने 8 जिंदगियां बचा लीं।
गद्दे और रजाइयां बनी जीवनरक्षक — उस रात की पूरी दास्तान
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक होटल में आग फैलते ही अफरातफरी मच गई। लोग खिड़कियों से झांकने लगे, कूदने को मजबूर थे क्योंकि अंदर धुआं भर चुका था। ऐसे में रियाजुद्दीन को किसी पड़ोसी का फोन आया कि उनकी दुकान के सामने वाले होटल में आग लग गई है।
बिना एक पल गंवाए, उन्होंने अपनी दुकान का शटर उठाया। बेटे अरमान को जगाया। और दोनों ने मिलकर एक के बाद एक गद्दे, रजाइयां और तकिए सड़क पर बिछाने शुरू कर दिए — ठीक उस जगह के नीचे जहां से लोग कूद रहे थे।
उनके इस साहसिक कदम की वजह से 8 लोग सुरक्षित रहे — जिनमें एक छोटा बच्चा भी शामिल था। ये वो लोग हैं जो उस रात शायद जिंदा नहीं बचते अगर नीचे गद्दे न होते।
अब मुआवजे की मांग — नुकसान की भरपाई कौन करेगा?
जान बचाने का वो जज्बा तारीफ के काबिल है, लेकिन उसके बाद की कहानी दर्दनाक है। उस रात बिछाए गए गद्दे, रजाइयां और बाकी सामान पूरी तरह खराब हो गया। इस नुकसान का बोझ रियाजुद्दीन के कंधों पर आ पड़ा।
अब मंसूरी ने सरकार से ₹2 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की है। उनका तर्क साफ है — होटल में आग मालिक की लापरवाही की वजह से लगी थी। उन्होंने किसी सरकारी आदेश पर नहीं, बल्कि मानवता की भावना से लोगों की मदद की। अब इस नेकी की कीमत उन्हें अकेले क्यों चुकानी पड़े?
💬 रियाजुद्दीन मंसूरी का पक्ष
- होटल में आग मालिक की लापरवाही से लगी थी, उनकी गलती नहीं थी।
- उन्होंने अपनी दुकान का पूरा सामान लगाया, जो पूरी तरह बर्बाद हो गया।
- उन्हें उम्मीद है कि सरकार या होटल मालिक ₹2 लाख रुपये का मुआवजा दें।
- उनका कहना है — "अकेले यह आर्थिक बोझ नहीं उठाना चाहिए।"
सरकारी मदद से पहले उतरे मैदान में — असली हीरोज़ की फेहरिस्त
उस रात रियाजुद्दीन और अरमान मंसूरी अकेले नहीं थे। जब अधिकारी और दमकल की गाड़ियां पहुंचने में देर लगा रही थीं, तब इलाके के कई आम लोगों ने अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों को बचाया:
ये वो लोग हैं जिन्होंने बिना किसी पद, पुरस्कार या पहचान की परवाह किए — सिर्फ इंसानियत की बुनियाद पर — जलते होटल से लोगों को बाहर निकाला।
21 मौतों का वो दर्दनाक हादसा — क्या हुआ था 3 जून को?
3 जून 2026 की शाम दक्षिण दिल्ली के हौजरानी इलाके स्थित फ्लोरिश स्टे होटल में अचानक आग भड़क उठी। देखते ही देखते पूरा होटल धुएं में डूब गया। होटल में बाहर निकलने का रास्ता बेहद सीमित था — और वो भी आग की चपेट में आ चुका था।
कई मेहमान अपने कमरों में बंद हो गए। कुछ ने खिड़कियां तोड़ीं। कुछ ने ऊंचाई से छलांग लगाई। इस दर्दनाक त्रासदी में कुल 21 लोगों की मौत हो गई — जिनमें 9 भारतीय और 12 विदेशी नागरिक शामिल थे। 37 से अधिक लोग घायल हुए।
🏨 फ्लोरिश स्टे होटल अग्निकांड — मुख्य तथ्य
- तारीख: 3 जून 2026
- स्थान: हौजरानी, मालवीय नगर, दक्षिण दिल्ली
- मौतें: 21 (9 भारतीय + 12 विदेशी)
- घायल: 37 से अधिक
- कारण: होटल मालिक की लापरवाही (जांच जारी)
- होटल मालिक लवकेश: गिरफ्तार, 5 होटल बंद
- मैनेजर: अभी भी फरार
होटल मालिक पर कार्रवाई — लेकिन हीरो की सुनवाई कब?
हादसे के बाद दिल्ली पुलिस और प्रशासन ने होटल मालिक लवकेश को गिरफ्तार किया। उनके 5 होटल बंद कर दिए गए। MCD ने मालवीय नगर और हौज खास में अवैध इमारतों पर बुलडोजर भी चलाया।
लेकिन उस रात जो लोग सबसे पहले मैदान में उतरे — वो रियाजुद्दीन मंसूरी जैसे आम नागरिक थे। उन्हें न कोई मेडल मिला, न कोई सरकारी सहायता। बस एक गुजारिश है — कि जो नुकसान उन्होंने इंसानियत की खातिर उठाया, उसकी भरपाई की जाए।
यह घटना हमें क्या सिखाती है?
दिल्ली के इस हादसे ने एक बार फिर साबित किया कि असली हीरो वर्दी पहनकर नहीं आते। वो आते हैं आम गलियों से, छोटी-छोटी दुकानों से — जिनके पास न बड़ा पद होता है, न बड़ी दौलत। बस होता है एक बड़ा दिल।
रियाजुद्दीन मंसूरी और उनके साथियों ने यह भी दिखाया कि सामुदायिक एकता और तत्काल मानवीय प्रतिक्रिया कितनी बड़ी भूमिका निभा सकती है — उन पलों में जब सरकारी मशीनरी अभी चल भी नहीं रही होती।
साथ ही यह घटना इमारतों की अग्नि सुरक्षा, आपातकालीन निकास व्यवस्था और होटल नियमों की कड़ाई से निगरानी की जरूरत को भी उजागर करती है — ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदी दोबारा न हो।
